क्यों फूट पड़ा गुस्सा?

देश के कई हिस्सों में छात्र और आम नागरिक सड़कों पर वह बचाने उतर गए हैं जिसे वे अपने देश की आजादी पर खतरे की तरह देखते हैं.

फोटोः सुमित सान्याल-गेट्टी इमेजेस
aajtak.in
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  • 14 जनवरी 2020,
  • अपडेटेड 4:46 PM IST

इंडिया टुडे टीम

सोलह दिसंबर को, कोलकाता की सड़कें पांच रैलियों से पट गईं. इनमें तीन राजनैतिक दलों ने आयोजित की थीं और दो हर क्षेत्र तथा वर्ग से जुड़े नागरिक समूहों ने. तकरीबन 50,000 पोस्टर, बैनरों से लैस लोग नागरिकता (संशोधन) कानून, या सीएए और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध में जोरदार नारों के साथ सड़कों पर उतर आए. 12 दिसंबर को सीएए के अस्तित्व में आने के बाद से ही देशभर में ऐसी ही रैलियां और विरोध प्रदर्शनों का तांता लग गया है. 3 जनवरी को बेंगलूरू में, लगभग 50,000 लोग 102 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी एच.एस. दोरैस्वामी को धर्मनिरपेक्षता पर सुनने के लिए ईदगाह-ए-जदीद मस्जिद में जुट गए.

इसी तरह, कोच्चि में मरीन ड्राइव पर 2 जनवरी को हजारों लोग विरोध प्रदर्शन के लिए पहुंच गए. हैदराबाद ने अपनी नाराजगी 5 जनवरी को 'मिलियन मार्च' के जरिए जाहिर की. महाराष्ट्र में दिसंबर के आखिरी दो हफ्तों में सभी 37 जिलों में विशाल रैलियां हुईं. इस बीच, उत्तर प्रदेश में 800 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया, 135 मामले दर्ज किए गए और 5,000 लोगों को हिरासत में लिया गया. ओडिशा के बालासोर से लेकर राजस्थान के जयपुर तक, सीएए को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और इसका असर भी दिख रहा है.

कई राज्यों में इस आंदोलन को राजनैतिक समर्थन मिला है. कोच्चि में मुस्लिम संगठनों और माकपा ने प्रदर्शनों की अगुआई की तो महाराष्ट्र में शिवसेना और कांग्रेस ने इसे भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने के मौके के रूप में देखा. इसी तरह, कर्नाटक में कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया; तमिलनाडु में द्रमुक और पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन प्रदर्शनों की अगुआई कर रही हैं. ममता ने कहा कि केंद्र उनकी लाश पर ही उनके राज्य में सीएए या एनआरसी को लागू कर सकता है.

राजनैतिक दलों के अपने-अपने तेवर हैं. मसलन, भाजपा इसे गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए भारत की नागरिकता के रूप में एक सुरक्षा कवच मुहैया कराने की बात कर रही है तो विपक्षी दलों का दावा है कि इस कानून से अंतत: मुसलमानों को निशाना बनाया जाएगा और उनकी रक्षा की जाए. लेकिन इन सबके बावजूद बहुत-से शहरों में आम लोग प्रतिरोध की जोरदार आवाज उठाने के लिए घरों से निकल आए हैं.

कॉलेज और विश्वविद्यालयों के युवा छात्र, प्रोफेशनल, बुद्धिजीवी, एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोग, कलाकार, मशहूर हस्तियां सभी ने अपनी जिम्मेदारी समझी है और देश के लोगों को संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को याद कराने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं. चाहे राजनैतिक दलों का आयोजित हो, या व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए या मुहल्लों में आयोजित सभाएं हों, इन प्रदर्शनकारियों ने हर राजनैतिक रंग से अलग भावनाओं के इजहार के लिए पोस्टरों-बैनरों के साथ उतरे हैं. इसका असर भी व्यापक है.

वे जानना चाहते हैं कि क्या एनआरसी उन गरीबों और हाशिए के वैध नागरिकों को ध्यान में रखेगा, जिन्होंने अपने दस्तावेज खो दिए हैं. उन्होंने इसके पीछे की मंशा पर सवाल उठाया है. वे पूछ रहे हैं कि देश में अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा की वर्तमान स्थिति को देखते हुए, क्या यह सीएए के लिए वाकई सही समय है. वे ऐसे नेता से डरते हैं जो इन मुद्दों की अनदेखी कर रहा है या जिसने अल्पसंख्यकों की चिंताओं को ध्यान में नहीं रखा है. उन्हें डर है कि भारत के लोगों को एक ही धर्म के हिसाब से ढालने की कोशिश हो रही है. उनके गुस्से और सवालों ने देशभर में एक महीने से अधिक समय से हलचल बनाए रखी है.

फहद अहमद, 26 वर्ष पीएचडी छात्र, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस्स), मुंबई

टिस्स के इस स्कॉलर की नजर में सीएए और एनआरसी सरकार की गलत प्राथमिकताओं की मिसाल हैं. अहमद सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ देश भर में 50 से अधिक विरोध प्रदर्शनों और जनसभाओं के आयोजन में सक्रिय रहे हैं. वे कहते हैं, ''एनआरसी गरीब-विरोधी, महिला विरोधी और मानवता विरोधी है. अगर किसी रजिस्टर की जरूरत है, तो बेरोजगारों या यौन उत्पीडऩ की शिकार महिलाओं का बनाइए.'' उनके मुताबिक, इसमें 'सरकार के शिक्षण संस्थाओं को निशाना बनाने' के खिलाफ छात्रों का गुस्सा भी दिखाई पड़ता है.

1,200

लोगों के खिलाफ सीएए विरोधी प्रदर्शनों में महाराष्ट्र के बीड, परभनी, हिंगोली जिलों में मामले दर्ज किए गए हैं

देबस्मिता चौधरी, 24 वर्ष अंतरराष्ट्रीय संबंध विषय में एमए की छात्रा, जाधवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता

हिम्मती चौधरी पश्चिम बंगाल में 24 दिसंबर को सीएए विरोधी प्रदर्शन का प्रतीक बन गईं. उन्होंने दीक्षांत समारोह के दौरान इस कानून की प्रति फाड़ी और नारा लगाया, ''हम कागज नहीं दिखाएंगे.'' सीएए को ''लोकतंत्र विरोधी, धर्मनिरपेक्ष विरोधी और संविधान की भावना के विरुद्ध' बताया और कहा, ''युवाओं के जोश को अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने में लगाने के बजाए, सरकार ने उन्हें विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतार दिया है.''

45 किमी

दूरी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीएए के विरोध में निकाली गई रैलियों में पदयात्रा करते हुए तय की

केरल

कोच्चि में 1 जनवरी को विभिन्न मुस्लिम समूहों ने सीएए विरोधी विशाल रैली की

678

लोगों को हिरासत में लिया गया जब 17 दिसंबर को मुस्लिम संगठनों की अचानक हड़ताल के दौरान हिंसा भड़क उठी

''सरकार हमारी आवाज को गुंडों के बल पर दबाने की कोशिश कर रही है... काश! हमारे प्रधानमंत्री संविधान को पढ़ते और उसकी भावना को समझने की कोशिश करते.''—इमैनुएल जे.

इमैनुएल जे.,  23 वर्ष बी.टेक छात्र, इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग,कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, तिरुवनंतपुरम

इमैनुएल ने 17 दिसंबर को सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए अपने दोस्तों के साथ एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग परीक्षा का बहिष्कार करके बड़ा जोखिम उठाया. इसी तरह, केरल की ए.पी.जे. अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी के लगभग 10,000 छात्र ने करियर को खतरे में डालकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों के प्रति एकजुटता दर्शाने के लिए विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए, जो कैंपस में क्रूर पुलिस कार्रवाई के शिकार हुए थे. छात्रों का राज्यपाल के आधिकारिक निवास राजभवन के सामने विरोध प्रदर्शन जारी है.

रचिता गोरोवाला, 32 वर्ष, फिल्मकार भोपाल

भोपाल में एनआरसी और सीएए के विरोध में 16 और 19 दिसंबर को सड़कों पर उतरे सैकड़ों लोगों में वे भी शामिल थीं. गोरोवाला के अनुसार, सरकार अर्थव्यवस्था की नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए सीएए ले आई है. गोरोवाला कहती हैं, ''भाजपा राजनैतिक लाभ के लिए हिंदू-मुस्लिम खाई को चौड़ा कर रही है.'' वे सीएए को रद्द करने की मांग करती हैं और कहती हैं, ''मुझे यह सोचकर ही क्रोध आता है कि मुझे कागजात दिखाने पड़ सकते हैं.'

43

मध्य प्रदेश के 52 में से 43 जिलों में एहतियातन सीआरपीसी की धारा 144 लगाई गई

मध्य प्रदेश

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने 25 दिसंबर, 2019 को भोपाल में सीएए विरोधी रैली का नेतृत्व किया

सलीला कप्पन, 45 वर्ष पीआर प्रोफेशनल बेंगलूरू

कप्पन तीन सीएए विरोधी प्रदर्शनों में भाग ले चुकी हैं और वे तब तक प्रदर्शनों का हिस्सा रहेंगी जब तक कि केंद्र सीएए वापस नहीं लेता या धार्मिक पूर्वाग्रह को नहीं हटाता. उनका मानना है कि सरकार नोटबंदी जैसी नीतियों की नाकामी को स्वीकार नहीं करके लोगों का भरोसा गंवा चुकी है. वे कहती हैं, ''सरकार पर यकीन करना मुश्किल है. अमित शाह कई बार कह चुके हैं कि सीएए, एनपीआर और एनआरसी को लागू किया जाएगा. कुछ राज्यों में एनपीआर प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है.''

80,000

बेंगलूरू में 23 दिसंबर 2019 को सीएए विरोधी मार्च की अगुआई ह्यूमैनिटी फाउंडेशन ने की

बिहार

सीएए और एनआरसी के विरोध में राजद नेता तेजस्वी यादव के आह्वान पर 21 दिसंबर 2019 को पटना के डाक बंगला चौराहे पर प्रदर्शनकारी

कर्नाटक

बेंगलूरू में 23 दिसंबर 2019 को कुद्दूस साहेब ईदगाह मैदान में प्रदर्शन

''गरीब और हाशिए पर जीने वाले लोगों, खासकर जिनके पास कोई जमीन या आधिकारिक दस्तावेज नहीं हैं, उनके लिए अपनी नागरिकता की रक्षा करना मुश्किल होगा.'' —संकेश कुमार

संकेश कुमार, 25 वर्ष नौकरी की तलाश में पटना

संकेश कुमार ने 2014 और 2019 में भाजपा को वोट दिया, लेकिन अब उनका ''मोहभंग हो रहा है.'' उन्होंने सीएए और एनआरसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया, लेकिन वे ज्यादा हिस्सा नहीं ले सकते क्योंकि उनकी प्राथमिकता अच्छी नौकरी पाने की है. वे कहते हैं, ''धार्मिक भेदभाव की सोच से भारत की धर्मनिरपेक्ष प्रतिष्ठा को नुक्सान होगा.'' उनका मानना है कि देश को एनआरसी की जरूरत है, लेकिन सरकार को सावधान रहना होगा कि ''राष्ट्र की छवि मुस्लिम विरोधी न बनने पाए.''

1,550

लोगों को बिहार में पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक सीएए विरोधी प्रदर्शनों में कथित हिंसा के लिए हिरासत में लिया गया है

—सोनाली आचार्जी के साथ रोमिता दत्ता, सुहानी सिंह, जीमॉन जैकब, राहुल नरोन्हा, अरविंद गौड़ा और अमिताभ श्रीवास्तव

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