आवरण कथाः एक विरोध का ताना-बाना

दिल्ली में सीएए/एनआरसी विरोधी आंदोलन ने हर तरह की सीमाओं को तोड़कर विशिष्ट तरह की सृजनशील एकजुटता का निर्माण किया, जिसके लिए इसे लंबे अरसे तक याद रखा जाएगा

25 पूरे हो चुके हैं 8 जनवरी तक दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए/ एनआरसी के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन को
aajtak.in
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  • 14 जनवरी 2020,
  • अपडेटेड 5:08 PM IST

सोनाली आचार्जी

मध्यरात्रि का घंटा बजने के साथ जब दुनिया नए दशक का स्वागत कर रही थी, तब 16 बरस की इंशा हुसैन दिल्ली के शाहीन बाग में कड़कड़ाती सर्दी में अजनबियों के एक समूह के साथ कंपकंपाती खड़ी थीं. उनके हाथ में एक प्लैकार्ड था, जिस पर लिखा था: 'फाइट फॉर आइडिया ऑफ इंडिया: डेमोक्रेसी, इक्वालिटी ऐंड फ्रीडम'. स्कूल में पढऩे वाली यह लड़की पहले कभी किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं हुई थी. कुछ ही हफ्ते पहले इंशा की सहेलियां अमानत बलात्कार मामले में दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों में शरीक हुई थीं, पर तब वे उनके साथ नहीं गईं. मगर नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ मौजूदा आंदोलन ने उनकी किसी रग को छेड़ दिया और उन्हें सड़कों पर ले आए.

इंशा कहती हैं, ''बीते कुछ वर्षों में लोगों ने मुझे आतंकवादी, धोखेबाज कहा. मैंने सब बर्दाश्त कर लिया. पर जब इस कानून ने मेरे धर्म के खिलाफ भेदभाव करना शुरू कर दिया, तो मैं घर के भीतर नहीं रह सकती. मैं नहीं चाहती कि देश का वह तबका ताकतवर महसूस करे, जिसके मन में अल्पसंख्यकों के प्रति कोई इज्जत नहीं है. आज वे मेरे साथ गाली-गलौज करते हैं, कल वे मेरे ऊपर पत्थर फेंकेंगे, अगर उन्हें लगा कि सरकार उनकी तरफदारी कर रही है.''

शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शन 15 दिसंबर को शुरू हुआ. यहां के बाशिंदों ने सीएए और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों के साथ हुई पुलिस हिंसा के विरोध में सड़क जाम कर दी. महिलाएं और छात्र तीन हफ्ते बाद भी यहां आसन जमाए बैठे हैं. कड़ाके की सर्दी, यह कानून, किसी नेता का न होना और ऑनलाइन ट्रॉल भी उनका हौसला नहीं तोड़ पाए. विकासशील समाज अध्ययन पीठ में असिस्टेंट प्रोफेसर और समाजशास्त्री संजीर आलम बताते हैं, ''शाहीन बाग दिल्ली में विरोध का चेहरा बन गया है और उस समूह के स्वरूप की वजह से, जो एक दूसरे की मदद के लिए गांठ बांधकर यहां एकजुट हो गया है.'' वे कहते हैं, ''पहले जब भी अल्पसंख्यकों के आंदोलन हुए हैं, उनका नेतृत्व आम तौर पर पुरुषों ने किया. अब इसका नेतृत्व औरतें और युवा कर रहे हैं. वे महज 'आम आदमी' ही नहीं, 'अदृश्य नागरिक' भी हैं. जब समाज के सबसे कमजोर तबके निकलकर आते हैं तो उनकी सहनशक्ति और प्रतिबद्धता हमेशा चकित करती है.''

राजधानी भर की कई छवियां—चाय पीते हुए हाथ तापतीं बुजुर्ग औरतें, अपने दोस्तों को आंदोलन में आने के लिए टेक्स्ट मेसेज भेजते छात्र तथा फर की टोपियां और हाइ हील पहने अपने पहले विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें इंस्टाग्राम पर डालते शहरी पेशेवरों के समूह—हालिया अतीत में हुए तीन विरोध प्रदर्शनों से मिलती-जुलती हैं. ये तीन आंदोलन हैं—2019 का मीटू आंदोलन, जिसकी अगुआई मुख्य रूप से अमीर उच्च-मध्यम वर्ग ने की थी; 2018 का सबरीमला आंदोलन, जिसमें बुजुर्ग महिलाएं बड़ी संख्या में बाहर आई थीं; और 2015 का फिल्म और टेलीविजन संस्थान के छात्रों का आंदोलन. ये समूह अपने दम पर मिलकर ऐसा आंदोलन खड़ा नहीं कर सके थे, जो वक्त की कसौटी पर खरा उतर पाता. यह इनका साथ आना ही है जिसने दिल्ली में सीएए विरोधी आंदोलन को लंबी जिंदगी और सृजनात्मकता दी है.

हमदर्द विश्वविद्यालय में बीबीए के छात्र और फोटोग्राफर 19 वर्षीय अरशद अहमद खान कहते हैं कि इस विरोध प्रदर्शन में हर समूह अपनी अलग-अनूठी चिनगारी लेकर आया है. वे कहते हैं, ''वरिष्ठ औरतें सहनशील और मजबूत हैं, शहरी समूह मीडिया मामलों में दक्ष हैं और बड़ी तादाद में छात्रों की मौजूदगी इस आंदोलन को वह रक्रतार दे रही है, जिसकी इसे जरूरत है. प्रदर्शनकारियों को समर्थन देने के लिए 70 से ज्यादा संगठन ऑनलाइन भी साथ आए हैं.'' खान को 19 दिसंबर को दरियागंज के विरोध प्रदर्शन के वक्त पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. वे कहते हैं, ''दरियागंज में हिंसा और पुलिस की कार्रवाई देखने के बाद मैं फिर बाहर निकलने में हिचक रहा था. पर जब मैंने शाहीन बाग में औरतों को पूरी रात ठंड में बैठे देखा, तो मेरी हिम्मत लौट आई.''

इसी तरह फिल्मकार और सार्वजनिक जगहों और लोगों की बेतरतीब तस्वीरें लेने वाले फोटोग्राफर 27 वर्षीय वैभव यादव 15 दिसंबर को जमिया के विरोध प्रदर्शन में थे. वे कहते हैं, ''पुलिस ने मेरा कैमरा तोड़ दिया और मुझे मारा. तभी से समुदाय के तौर पर इस विरोध में शामिल होने की अहमियत मुझे समझ में आ गई. अगर एक गिरता है, तो दूसरा सहारे के लिए आगे आ जाता है. यही वह राज है जिसके चलते शाहीन बाग इतने लंबे वक्त तक टिका रहा.'' यादव ने मेडिकएड के साथ भागीदारी में इस इलाके में अब एक मेडिकल कैंप लगाया है. सर्द हवाओं में बहादुरी से डटे लोगों में जिसे भी जरूरत होती है, उसे यहां दवाइयां और फर्स्ट-एड दी जाती है.

उस शहर में जहां सुरक्षा लगातार चिंता का विषय है, औरतें बड़ी तादाद में निकलकर आ रही हैं— शाहीन बाग में ही नहीं, बल्कि पूरे शहर में, हर सामाजिक तबके की औरतें—पूरे दिन, यहां तक कि आधी रात को भी. जामिया में युवा लड़कियां अपने चेहरों पर खरोंचों के निशान लिए उस पुलिस अफसर को लगभग ललकारती-सी सामने आ रही हैं जो कैंपस के बाहर उनकी बनाई कतार की बगल से गुजरता है. 17 दिसंबर को ट्विटर पर दिल्ली की औरतों से आह्वान किया गया कि वे आइटीओ के पास एक पार्क में इकट्ठा हों. 350 से ज्यादा औरतें आ गईं.

दफ्तरों से, कॉलेजों से, स्कूलों से, अपने घरों से. सेंटर फॉर जेंडर ऐंड एजुकेशन, निरंतर की सदस्य 38 वर्षीया रितुपर्णा बोरा कहती हैं, ''औरतें दमन का मतलब समझती हैं. हम जानते हैं कि दमन कैसे शुरू होता है—सीएए और एनआरसी से आने वाले दिनों में अल्पसंख्यकों के दमन की शुरुआत होगी.'' बोरा असम में एनआरसी की प्रक्रिया से जुड़ी रही हैं और जानती हैं कि यह अपने साथ क्या लेकर आएगा. वे कहती हैं, ''नागरिकता को उन तबकों के दमन के औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है जिनकी सरकार परवाह नहीं करती. यह फासीवाद का जन्म है.''

एक और बात जो विभिन्न समूहों को एकजुट कर रही है, वह राजनेताकों और सोशल एक्टिविस्टों को इस आंदोलन को हथियाने से रोकने की अनकही कोशिश है. यहां भाषण देने वाला कोई एक नेता नहीं है और न ही नारे तय करने वाली कोई एक पार्टी है, सीएए विरोधी आंदोलन में सृजनात्मकता का असाधारण उफान आ गया है. जंतर-मंतर पर 19 दिसंबर के प्रदर्शन में लड़कियों ने शांति के प्रतीक के रूप में पुलिस को गुलाब के फूल भेंट किए. बुजुर्ग औरतों के एक समूह ने 20 दिसंबर को इंडिया गेट पर बगैर पैसे लिए मेहंदी के टैटू बनाए. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने 22 दिसंबर को 'हग (गले लगाना) स्टेशन' स्थापित किया, जहां साथ होने की भावना और संवेदना को बढ़ावा देने के लिए 'फ्री हग' की पेशकश की गई.

एक हालिया विरोध प्रदर्शन में 5 जनवरी को राजीव चौक पर कलाकारों ने फुटपाथों पर चॉक से संविधान की इबारतें उकेर दीं. दिल्ली में कई विरोध प्रदर्शनों में कविता पाठ, कराओके के सत्र, थिएटर के शो हुए, रंगोलियां और कल्पनाशील बैनर बनाए गए. लफ्जों और जज्बात की इस सामूहिक साझेदारी ने खासकर युवाओं के बीच विरोध की आग को जलाए रखा. फ्रीलांस एडिटर 28 वर्षीया नेहा भसीन कहती हैं, ''कला और कॉमन कॉज जोड़ता है जबकि राजनीति बांटती है.'' उनके प्लैकार्ड पर अंग्रेजी में लिखा है: 'सीएए अंतर्मुखी लोगों को भी बाहर निकाल लाने में कामयाब रहा'.

यही सृजनात्मकता तब भी दिखाई देती है जब बाधा डालने की संभावित कोशिशों को रोकने के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जाता है. मिसाल के लिए, एक क्लोज्ड-ग्रुप प्लेटफॉर्म सिग्नल के एडमिन केवल उन्हीं अकाउंट को जोड़ रहे हैं जिनके सीएए विरोधी मकसद के लिए प्रतिबद्ध होने की तस्दीक हो चुकी है. यह तस्दीक आम तौर पर किसी ऑफलाइन विरोध प्रदर्शन में की जाती है.

डेवलपमेंट सेक्टर में कार्यरत कंसल्टेंट 26 वर्षीया शल्मोली हलदर कहती हैं, ''विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है. हांगकांग के विरोध प्रदर्शनों से प्रेरणा लेकर हम भी इसके इस्तेमाल से ऐसे फुटेज तैयार कर रहे हैं, जिन्हें हम टोरंटो यूनिवर्सिटी की मदद से संग्रहालय में रख सकने की उम्मीद कर रहे हैं. हम आज जो रुख अपना रहे हैं, उसे भुलाया नहीं जाना चाहिए.'' शल्मोली कहती हैं कि 15 दिसंबर को जामिया के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के बाद उनके भीतर कुछ बुनियादी तौर पर बदल गया. अब वे सीएए के खिलाफ 200 सदस्यों के अंतरराष्ट्रीय एकजुटता समूह के समन्वयकों में से एक हैं.

सीएए समर्थक खेमे का कहना है कि यह कानून मुसलमानों को बाहर रखने के बारे में कुछ नहीं कहता, वहीं प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह मुसलमानों को छोड़कर हरेक को पिछले दरवाजे से आने देता है, अगर वे प्रस्तावित एनआरसी में अपना नाम दर्ज कराने में नाकाम हो जाते हैं. सरकार इस कानून के समर्थन में घर-घर अभियान चलाने का मंसूबा बना रही है. ऐसे में सीएए के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों के लिए भी जरूरी है कि वे अपनी आपत्तियों को सिलसिलेवार इकट्ठा करके लोगों के सामने लाने के तरीके खोजना जारी रखें. उन्हें आम नागरिकों की चिंताओं को भी जोर-शोर से सामने लाना होगा.

ठीक वैसी ही जैसी पुरानी दिल्ली की 62 वर्षीया टेलर मुसान खान की चिंताएं हैं. मुसान बताती हैं कि वे ऐसे कई बालिगों को जानती हैं जिन्हें बचपन में तिलांजलि दे दी गई थी या जो अनाथ हो गए थे. उनके ऐसे भी रिश्तेदार हैं जिनके कागजात आग में जलकर खाक हो गए या अपने गांवों से दिल्ली आकर बसने में खो गए. उनका कहना है कि ये लोग कम मजदूरी कमाने वाले कामगार हैं और नए कागजात बनवाने का खर्च नहीं उठा पाएंगे. वे कहती हैं, ''एनआरसी गरीबों और हाशिए के लोगों पर बोझ होगा.'' वे बताती हैं कि उनकी कॉलोनी में जन्म और पूर्वजों के नए कागजात बनवाने का खर्च करीब 50,000 रुपए बताया जा रहा है. वे कहती हैं, ''अगर हम अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाते हैं या वे मनमानी वजहों से हमें खारिज कर देते हैं, तो उस हालत में मुसलमान नहीं बल्कि दूसरे समुदाय यहां बने रहने के लिए सीएए का प्रयोग कर सकते हैं.''

यह भविष्य ही है, जो जामिया में मीडिया स्टडीज के छात्र 26 वर्षीय फैजान आलम को चैन की नींद नहीं सोने दे रहा. वे कहते हैं, ''हिंसा मुख्य तौर पर मुस्लिम मोहल्लों में की गई. क्या यह इस बात का इशारा नहीं है कि सीएए का अल्पसंख्यकों के लिए क्या मतलब है? जिन्हें यह खारिज कर देगा, उनके लिए सरकार के पास क्या योजना है? हमने असम के डिटेंशन सेंटरों में बंद बच्चों की तस्वीरें देखी हैं. और (प्रधानमंत्री) मोदी कहते हैं कि हमारे लिए चिंता की कोई बात नहीं है.''

मगर दिल्ली के प्रदर्शनकारियों ने ठान लिया है कि वे तानाशाही नेतृत्व के हाथों अपनी आवाज को खामोश नहीं होने देंगे. दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य की छात्रा 18 वर्षीया आयुषा सिंह ऐसी ही आवाजों में से एक हैं. वे कहती हैं, ''इस आंदोलन में मुझे भरोसा है. एकजुट लोग हमेशा जीत हासिल करेंगे.'' इधर वे जंतर मंतर की भीड़ में दोबारा शामिल हुईं और उधर कोहरे के साथ प्रदर्शनकारियों के जत्थे के जत्थे आने लगे. बूढ़े और नौजवान, अमीर और गरीब, सोशल मीडिया, विचारधारा और विश्वास के धागों से जुड़े और एकजुट.

—सोनाली आचार्जी

चरितार्थ भारती,  27 वर्ष, सिंगापुर में वकील

वे विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकार ने 2014 के बाद से ऐसे कई कदम उठाए हैं जिनसे आइडिया ऑफ इंडिया बदल गया है. भारती का कहना है, ''वे देश को अपनी विचारधारा के अनुसार ढालने की कोशिश कर रहे हैं.'' वे कहते हैं कि वर्तमान विरोध प्रदर्शन को सिर्फ एक कानून के संदर्भ में नहीं लिया जाना चाहिए, बल्कि यह इसके लिए है कि हम आखिर कैसा देश बनना चाहते हैं. वे इससे प्रोत्साहित हुए कि लोग देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने की रक्षा के लिए साथ आने को तैयार हैं.

शल्मोली हलदर, 26 वर्ष, डेवलपमेंट कंसल्टेंट

मौजूदा आंदोलन उनके हमउम्रों के लिए ज्यादा मायने रखता है, क्योंकि अतीत के मुद्दे आधारित विरोधों के विपरीत, यह भारत के विचार पर ही सवाल उठाता है. वे कहती हैं, ''यह हमारे मूल्यों को पुनर्परिभाषित करेगा.'' वे चाहती हैं कि सरकार भय का माहौल बनाने से बचे और ऐसे कानूनों की राजनीति से दूर रहे जो धर्म के आधार पर भेदभाव करते हैं. उनका मानना है कि नागरिकता वैधता के आधार पर दी जानी चाहिए. जब बात नागरिकों का रिकॉर्ड तैयार करने की हो तो लोगों की आय, सामाजिक-आर्थिक और धार्मिक बारीकियों को ध्यान में रखते हुए उचित तरीका चुनने की जरूरत है.

अरशद अहमद खान, 19 वर्ष, फोटोग्राफर, बीबीए स्टुडेंट, हमदर्द विश्वविद्यालय

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पुलिस की हिंसा और सरकार का इससे या माफी मांगने से इनकार करने के बाद, अरशद इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए. वे कहते हैं, ''वे स्पष्ट रूप से मुस्लिम समुदाय की सुरक्षा को महत्वपूर्ण नहीं मानते.'' अगर सरकार सीधे छात्रों और मुस्लिम समुदाय से बात करे और धर्म के आधार पर भेदभाव न करे तो उसी में सबका फायदा है. वे नहीं चाहते कि भाजपा उन लोगों को मजबूत करे जो सांप्रदायिक आधार पर नफरत फैलाना चाहते हैं.

आयुषा सिंह, 18 वर्ष, छात्रा, बीए (ऑनर्स) इंग्लिश, डीयू

उनका परिवार दक्षिणपंथी झुकाव वाला है पर किसी भी तरह की अतिवादी विचारधारा आयुषी को बेचैन कर देती है. जब उन्हें कहा गया कि वे छात्रा हैं और उन्हें विरोध की बजाए क्लास में होना चाहिए, तो वे जवाब देती हैं, ''मैं यहां इसलिए हूं क्योंकि मैं शिक्षित हूं.'' उनकी नजर में, यह प्रतिरोध उस चरमपंथ के खिलाफ है जिसका भाजपा प्रतिनिधित्व करती है. आयुषा कहती हैं, ''हम रातोरात यहां नहीं पहुंचे हैं. वे लंबे समय से नफरत के बीज बोते रहे हैं. लेकिन लोगों को अब यह समझ में आने लगा है.''

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