''टेक्नोलॉजी ने तीव्रता से फैसले लेने में काफी मदद की है’’

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री विवादास्पद परियोजनाओं को वीडियो कॉन्फ्रेंस पर हड़बड़ी में हरी झंडी दिए जाने से इनकार करते हैं.

प्रकाश जावडेकर
अमरनाथ के. मेनन
  • नई दिल्ली,
  • 17 जुलाई 2020,
  • अपडेटेड 9:13 PM IST

● आलोचकों का कहना है कि आखिर मंत्रालय लॉकडाउन के दौरान पर्यावरण संबंधी मंजूरी के लिए परियोजनाओं की जांच क्यों कर रहा था जब प्रभावित लोग न तो सुबूत दे सकते थे और न उनका कोई प्रतिनिधित्व मुमकिन था? और न ही परियोजनाओं को मंजूरी देने वाली समिति उन्हें दी गई सूचनाओं के सत्यापन के लिए साइट का दौरा कर सकती थी.

हर काम तय प्रक्रियाओं का पालन करते हुए किया गया. कोई भी प्रस्ताव जनता की राय लेने के बाद ही विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) के सामने रखा गया. प्रस्ताव मिलने के 60 दिन के भीतर ईएसी के प्रक्रियाएं पूरी कर लेने की अपेक्षा होती है. इसलिए ये बैठकें तय समय में की गईं.

वन या वन्यजीव संबंधी मंजूरियों के प्रस्ताव पर भारत सरकार तभी विचार करती है जब इन्हें पूरी तरह साइट पर जाकर सत्यापित किया जाता है और जब राज्य सरकारें या राज्य वन्यजीव बोर्ड इसकी सिफारिश करता है. ऐसे में, यह दावा कि प्रभावित लोग अपने साक्ष्य या प्रतिनिधित्व लॉकडाउन में नहीं पेश कर सके, यह भ्रामक है. साथ ही हर परियोजना के लिए साइट का दौरा अनिवार्य नहीं है. यह उस स्थिति में किया जा सकता है जब ऐसा करना जरूरी लगे.

● कुछ आलोचक सवाल करते हैं कि पर्यावरणीय मंजूरियों के लिए जरूरी कानूनों में वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए दी जाने वाली मंजूरियों का कोई प्रावधान नहीं है. और जैसा कि अमूमन कायदा है—दिन भर के विचार-विमर्श की बजाए ये बैठकें महज दो घंटे की थीं. ऐसा क्यों भला?

प्रासंगिक प्रावधानों में इन बैठकों को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए करने की मनाही नहीं है. कोविड-19 की वजह से पैदा हुई असाधारण परिस्थितियों ने लोगों को जीने के लिए नए तरीके खोजने पर विवश किया है. यही नहीं, इन समितियों के कई विशेषज्ञ सदस्य उम्रदराज हैं और जिनके लिए संक्रमण का खतरा अधिक है.

ऐसी परिस्थितियों में तकनीक सटीक और समुचित फैसले लेने के लिए रास्ता मुहैया कराती है. जैसा कि मैंने कहा, यह बताना जरूरी है कि सारी परियोजनाओं को पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद ही मंजूरी दी गई है और बैठक के ब्योरे सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं.

● मंजूरी देना इतना जरूरी क्यों था? क्या लॉकडाउन खत्म होने का इंतजार नहीं किया जा सकता था? आलोचकों का आरोप है कि विकास के नाम पर इन मंजूरियों मे तेजी दिखाने का मतलब पर्यावरणीय प्रभावों के प्रति लापरवाही भरा रवैया अपनाना है.

सरकार देरियों में कमी लाकर काम को तेज करने की दिशा में लगातार काम कर रही है. इस मंत्रालय के पास आए प्रस्तावों पर विचार करना महत्वपूर्ण है और किसी को भी मंजूरी देने में कोई शॉर्ट-कट नहीं अपनाया गया है. साथ ही कोविड-19 से उपजी अनिश्चितता को देखते हुए यह कह पाना व्यावहारिक रूप से मुमकिन नहीं कि सामान्य कामकाज की स्थिति बहाल होने में कितना समय लगेगा.

● आलोचकों का दावा है कि ईआइए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन 2020 कई पर्यावरणीय नियमों को कमजोर कर रहा है और इससे कई प्रदूषणकारी उद्योगों को काम जारी रखने की छूट मिल रही है. ये भी आरोप हैं कि मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारियों की राय के उलट आपने आम लोगों से लिए जाने वाले मशविरे की अवधि को कम करने की कोशिश की.

यह मसौदा सभी हितधारकों के साथ व्यापक बातचीत के बाद तैयार किया गया है और यह प्रक्रिया सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है. यहां तक कि इसके लिए एक विशेषज्ञ समिति भी गठित की गई थी. मसौदा आखिरी कानून नहीं होता है. इसे चर्चा के लिए खोल दिया गया है.

मंत्रालय को भेजी गई हर सलाह पर विचार किया जाएगा और अगर वह तथ्यात्मक हुआ तो उसे शामिल भी किया जाएगा. मसौदा तैयार करने में हर कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है और इसे सार्वजनिक विमर्श के लिए खोल दिया गया है. किसी एक भी प्रावधान का उल्लंघन नहीं किया गया है.

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