मुझे कामयाबी जरूर मिलेगीः आनंदीबेन पटेल

नरेंद्र मोदी के शानदार कार्यकाल की साक्षी रही मुख्यमंत्री की कुर्सी की नजरें अब आनंदीबेन पटेल पर टिकी हुई हैं. क्या वे इस महती जिम्मेदारी को निभाने में कामयाब होंगी?

उदय माहूरकर
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  • 03 जून 2014,
  • अपडेटेड 11:34 AM IST

नरेंद्र मोदी के शानदार कार्यकाल की साक्षी रही मुख्यमंत्री की कुर्सी की नजरें अब आनंदीबेन पटेल पर टिकी हुई हैं. क्या वे इस महती जिम्मेदारी को निभाने में कामयाब होंगी? सीनियर एडिटर उदय माहूरकर से बातचीत के दौरान वे पूरी तरह आश्वस्त दिखीं. प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के अंश:नरेंद्र मोदी की विरासत को आगे बढ़ाना क्या मुश्किल नहीं होगा? नहीं. पिछले 17 वर्षों से नरेंद्रभाई के साथ काम करते हुए मैंने प्रमुख मंत्रालयों को संभाला है. उन्होंने एक मजबूत बुनियाद तैयार की है, जहां से मुझे आगे काम करना है. मैंने पूरी निष्ठा से काम किया है. मुझे कामयाबी मिलेगी. आप मोदी के साथ अपनी तुलना किस तरह करना चाहेंगी?  तुलना करना गलत होगा. हर व्यक्ति के काम करने का अपना अंदाज होता है, जिसका सम्मान करना चाहिए. कोई भी नरेंद्रभाई की ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकता. उनकी उपलब्धियों को देखें तो लगता है, मानो उन पर कोई दैवी कृपा रही है. मैं एक कर्तव्यनिष्ठ सामान्य व्यक्ति हूं.मुख्यमंत्री बनकर आपको कैसा लग रहा है? मुझे लगता है कि बीजेपी ने मुझे मौका देकर महिलाओं के सशक्तीकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है. मुझे इस पर बहुत गर्व महसूस हो रहा है. नरेंद्रभाई के लिए यह और भी बड़ी उपलब्धि है क्योंकि वे लगातार कहते रहे हैं कि समाज को औरत की शक्ति का प्रभावी इस्तेमाल करना चाहिए. यह महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए मोदी सरकार के प्रयासों का ही नतीजा है. मुझे अब भी याद है कि 2001 में उनके मुख्यमंत्री बनने पर जब मैंने उन्हें जानकारी दी कि गुजरात में महिला और बाल कल्याण के लिए कोई अलग मंत्रालय नहीं है, तो वे हैरान रह गए थे. वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने राज्य में इस मंत्रालय की शुरुआत की. आज राज्य में सखी मंडलों के रूप में काम कर रही महिलाओं की दो लाख स्वयं सहायता सहकारी समितियों के जरिए 1,700 करोड़ रु. का करोबार हो रहा है. इससे करीब 30 लाख से अधिक महिलाएं देश में कई जगहों पर दिख रहे सब्सिडी मॉडलों से उलट आत्म सम्मान के साथ कमा रही हैं. उसके बाद हमने नारी अदालत शुरू की, जहां महिलाओं से जुड़े मामलों को सुलझाया जाता है. फिर संपत्ति के मालिकाना हक में महिलाओं को बराबर का भागीदार बनाने के उद्देश्य से हमने एक नया नियम बनाया कि अगर संपत्ति की मालिक कोई महिला है तो उसे पंजीकरण शुल्क नहीं देना होगा. इससे राज्य कोषागार को पिछले 10 साल में 560 करोड़ रु. करोड़ का घाटा हुआ. लेकिन इसने कई महिलाओं को संपत्ति का मालिक बनने का मौका दिया और उन्हें सुरक्षित भविष्य दिया. मुख्यमंत्री के रूप में आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता क्या है?मैं चाहती हूं कि टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर जोर हो. कलेक्टर और जिला विकास अधिकारियों को शामिल कर ग्रामीण क्षेत्रों में लोक दरबारों के आयोजन के तौर पर एक ऐसी प्रणाली तैयार की जाए, जिससे लोगों को अपनी ज्यादातर समस्याओं के लिए गांधीनगर सचिवालय तक आने की जरूरत ही न पड़े. विचार यह है कि लोग जहां रहते हैं, वहीं उनकी समस्याओं को सुलझया जाए. साथ ही मैं चाहती हूं कि अधिकारी अपने ऑफिस से काम करने की बजाए लोगों के बीच जाकर काम करें. मेरा अनुभव कहता है कि प्रशासन में सुधार करने के लिए यह सबसे जरूरी है.  एक मंत्री के रूप में आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?एक नहीं, कई हैं. पिछले 17 वर्षों में कई उपाय पेश किए, जिससे जमीनी स्तर पर लोगों के जीवन में बदलाव हुआ. लेकिन जिस काम ने मुझे वाकई संतोष दिया, वह है ग्रामीणों और जमीन मालिकों की समस्याओं को समझकर टेक्नोलॉजी के जरिए राजस्व मंत्रालय में किए गए बदलाव. इससे गांव के हरेक आदमी को फायदा हुआ है. वर्षों से चले आ रहे खेतिहर कानून के बावजूद कुछ छोटे किसान ऐसे भी थे, जो उन खेतों के मालिक नहीं थे जिन्हें वे जोत रहे थे. मैंने इन गरीब किसानों को जमीन का वैध मालिक बनाने के लिए जरूरी संशोधन किए. जमीन परियोजना नाम की मेरी ई-शासन परियोजना ने जमीन से जुड़े धोखाधड़ी के साम्राज्य को करीब-करीब खत्म कर दिया है. जब मैंने राजस्व का पदभार संभाला था तो वहां 15 वर्षों से लंबित करीब 165 फाइलें पड़ी थीं. आज मेरे ऑफिस में ऐसी कोई फाइल नहीं, जो छह महीने से ज्यादा पुरानी हो. प्राथमिक स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में मैंने जो सुधार किए, वे भी कामयाबी की कहानियों में से ही एक हैं. आपको कहां से प्रेरणा मिलती है ?मुझे लोगों के बीच जाने से प्रेरणा मिलती है. मेरी इसी आदत ने मुझे शासन का तरीका सिखाया है. इससे किसी एडमिनिस्ट्रेटर को प्रशासनिक या प्रबंधन की डिग्री के मुकाबले कई गुना ज्यादा सीखने का मौका मिलता है. पार्टी के कुछ कार्यकर्ता आपको अहंकारी समझ्ते हैं, क्यों?यह पूरी तरह से गलत धारणा है. सुशासन के हित में, जो सिर्फ  नीतिपूर्ण शासन से ही संभव है, मैं कभी-कभी कार्यकताओं के कामों के लिए मना कर देती हूं. इसलिए मैं सख्त दिखाई देती हूं. हालांकि, ऐसे भी कई मौके आए हैं, जब मैंने कार्यकर्ताओं की उचित बातों को स्वीकारा है. 

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