'मुख्यमंत्री ने पुलिस को फ्री-हैंड दिया है'

यूपी के अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी), कानून और व्यवस्था प्रशांत कुमार कानपुर में विकास दुबे प्रकरण पर चल रही पुलिस जांच के हर पहलू की लगातार निगरानी कर रहे हैं. इसी व्यस्तता के बीच उन्होंने 13 जुलाई की दोपहर लखनऊ में यूपी पुलिस मुख्यालय के सिग्नेचर भवन में असिस्टेंट एडिटर आशीष मिश्र से बातचीत की.

मनीष अग्निहोत्री
आशीष मिश्र
  • उत्तर प्रदेश,
  • 25 जुलाई 2020,
  • अपडेटेड 1:28 PM IST

यूपी के अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी), कानून और व्यवस्था प्रशांत कुमार कानपुर में विकास दुबे प्रकरण पर चल रही पुलिस जांच के हर पहलू की लगातार निगरानी कर रहे हैं. इसी व्यस्तता के बीच उन्होंने 13 जुलाई की दोपहर लखनऊ में यूपी पुलिस मुख्यालय के सिग्नेचर भवन में असिस्टेंट एडिटर आशीष मिश्र से बातचीत की. अंश:

विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

जो भी एनकाउंटर पर सवाल उठा रहा है उसे बेसिक जानकारी नहीं है. कहीं से भी यह प्रकरण गलत नहीं है. मध्य प्रदेश पुलिस ने लिखा-पढ़ी में विकास को यूपी पुलिस को सौंपा था. यूपी पुलिस की पूरी फ्लीट मध्य प्रदेश गई थी. वह इसलिए कि विकास जैसा खतरनाक अपराधी पुलिस कस्टडी से भाग भी सकता था. लोग पुलिस पर अटैक करके उसे छुड़ा भी सकते थे. अगर विकास को अपराधी छुड़ा ले जाते तो पूरे सिस्टम की कितनी फजीहत होती. एनकाउंटर सरकार की नीति नहीं है. लेकिन पुलिस पर हमला करेंगे तो पुलिस भी जवाब देगी.

एमपी से लाए जाते वक्त विकास जिस गाड़ी में बैठा दिखाई दिया था वह, और जो गाड़ी एनकाउंटर से पहले कानपुर में पलटी वह दूसरी थी. आखि‍र गाड़ी कैसे बदल गई?

अपराधी की सुरक्षा की दृष्टि से यह एक रणनीतिक चाल होती है. मुझे पूरे तथ्य नहीं मालूम लेकिन जांच में विकास दुबे को लाने वाले पुलिस बल के टीम कमांडर को इन सवालों के जवाब देने होंगे. देखिए, ऐसे प्रश्न पूछने का हक केवल ऐसी संस्थाओं को है जिनके प्रति पुलिस जवाबदेह है.

विकास दुबे को ला रही एसटीएफ की टीम के साथ मीडिया को चलने से रोका गया. एनकाउंटर से पहले भी बैरिकेडिंग लगाकर मीडिया को रोक दिया गया था. ऐसा क्यों?

आप पर कोई कार्रवाई नहीं की गई, यही क्या कम है. मीडिया की गाड़ी पर प्रेस का बाकायदा बोर्ड लगाते, हमको बताते कि पुलिस की टीम को फॉलो करना है, तब पुलिस रोकती तो सवाल उठाते. मैं पत्रकारिता पर सवाल नहीं उठा रहा, लेकिन ऐसे चोरी-चोरी पीछा करने से बात बिगड़ सकती थी क्योंकि पुलिस वालों को नहीं मालूम था कि जो गाड़ी उन्हें लगातार फॉलो कर रही है उसमें पत्रकार बैठा है या कोई और. कोरोना संक्रमण की वजह से कानपुर जैसे हर बड़े शहर की ओर आने वाले हाइवे पर बैरिकेडिंग लगाकर जांच की जा रही है. एनकाउंटर वाले दिन भी ऐसा ही था. कानपुर में पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद से सभी हाइवे पर और सख्त जांच हो रही थी.

कानपुर हाइवे पर गाड़ी पलटने और विकास दुबे के हथि‍यार छीनकर भागने के बाद पुलिस मुठभेड़ की बात पर लोग संदेह कर रहे हैं.

दस जुलाई की सुबह बारिश हो रही थी. विकास को ला रही गाड़ी की रफ्तार तेज थी. सुबह साढ़े छह बजे के बीच अचानक गाय आ जाने से गाड़ी पलट गई. गाड़ी पलटने से पांच सिविल पुलिस के लोगों को चोट आई. वे खून से लथपथ थे. गोली लगने से दो कमांडो घायल हुए. यह मेरा नहीं बल्कि‍ इन सबका मेडिकल करने वाले मुख्य चिकित्साधि‍कारी (सीएमओ) का बयान है. अगर पुलिस को प्रायोजित ढंग से विकास का एनकाउंटर करना होता तो रात में झांसी से यूपी की सीमा में प्रवेश करते ही कर दिया जाता. सुबह का इंतजार क्यों करते और कानपुर के एक व्यस्ततम हाइवे पर एनकाउंटर क्यों करते? सुप्रीम कोर्ट ने एनकाउंटर में होने वाली मौतों के पोस्टमॉर्टम और अन्य जरूरी प्रक्रियाओं की गाइडलाइन तय कर रखी है. हम वह सारी प्रक्रियाएं सख्ती से फॉलो कर रहे हैं.

विकास अगर जिंदा पकड़ा जाता तो पूछताछ में कई सारे राज पता चलते, बहुत लोग बेनकाब होते.

इतने दिन से वह बाहर था, कोई राज सामने आया क्या? विकास दुबे से जुड़े सारे 'ट्रेल' (निशानी), कॉल रिकॉर्डिंग, पैसे के लेनदेन सब मौजूद हैं, इसकी जांच से ही विकास से जुड़े सारे राज खुल जाएंगे.

कई सारे एनकाउंटर होने के बावजूद बदन सिंह बद्दो जैसे कई दुर्दांत अपराधी पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ पा रहे हैं.

यूपी पुलिस की ओर से हर जिले के टॉप टेन अपराधि‍यों को चिन्हि‍त करके सबके लिए अलग-अलग रणनीति बनाकर कार्रवाई की जा रही है. पिछले एक महीने में अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे अपराधि‍यों के खि‍लाफ जो कार्रवाई हुई है वैसी अभी तक नहीं हुई थी. पुलिस अपराधि‍यों पर कड़ी कार्रवाई कर रही है. इसमें जात, पांत, धर्म, संप्रदाय नहीं देखा जाता.

नोएडा में जिम संचालक को पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर में मारने की कोशि‍श की. विपक्षी दल इस पर सवाल खड़े कर रहे हैं.

यह एनकाउंटर नहीं था. एक दरोगा ने आवेश में आकर गोली मारी. दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की गई है. उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है. एक दो अपवाद को छोड़कर एनकाउंटर पर सवाल नहीं उठा सकते.

अपराधी और पुलिस का गठजोड़ टूट नहीं पा रहा है.

इसी विकास दुबे पर 2007 से 2012 तक एक भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था. राज्यमंत्री की हत्या से छूटने के बाद विकास ने कोर्ट में अपील तक दायर नहीं होने दी थी. अब ऐसा नहीं है. अपराधि‍यों से संपर्क रखने वाले पुलिसकर्मियों पर सख्त कार्रवाई की जा रही है. इन्हें जेल भेजा गया है.

पुलिस पर राजनैतिक दबाव में काम करने का आरोप लग रहा है.

पहली बार ऐसे पुलिसकर्मियों को बर्खास्त किया गया है. पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने पुलिस को फ्री-हैंड दिया है. पुलिस पर किसी प्रकार का राजनैतिक दबाव नहीं है.

अभि‍योजन की खामियों के कारण पुलिसकर्मियों को सजा नहीं मिल पा रही है.

यूपी में ई-प्रॉजीक्यूशन सिस्टम लागू किया गया है. इसके अच्छे नतीजे सामने आए हैं. वर्तमान में देश में 'प्रॉजीक्यूशन' के मामले में यूपी सबसे अच्छी स्थिति में है.

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