आयुष्मान खुरानाः मर्दों वाली बात

सुहानी सिंह से बातचीत में आयुष्मान खुराना ने कहा कि दम लगा के हइशा के बाद उनका छोटे शहरों वाला मर्दाना गुरूर कम हो गया है. खास बातचीत के मुख्य अंश-

एक्टर आयुष्मान खुराना से करिअर, ऐक्टिंग और फिल्मों के बारें में बातचीत
शाग़िल बिलाली/शिवकेश मिश्र
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  • 15 अगस्त 2017,
  • अपडेटेड 12:59 PM IST

सवालः ऐक्टर न होते तो आप क्या कर रहे होते?

आयुष्मानः कई काम पहले ही कर चुका हूं. अब तो कॉलम भी लिख रहा हूं. शुरुआत रेडियो प्रस्तोता के रूप में की थी. फिर थिएटर में ऐक्टिंग की, टीवी ऐंकर और म्युजिशियन बना. अब ऐक्टर हूं. समझ नहीं आ रहा, अब क्या करूं.

 

सवालः आपकी अब तक की सबसे पसंदीदा फिल्म?

आयुष्मानः जो जीता वही सिकंदर. इस फिल्म की वजह से मुझे बोर्डिंग स्कूल में पढऩे की सनक चढ़ गई थी. मैं हमेशा देविका जैसी लड़की के गर्लफ्रेंड बनने का ख्वाब देखता रहा और मिली मुझे अंजलि.

 

सवालः ऐक्टिंग के बारे में सबसे अच्छी और खराब बात क्या है?

आयुष्मानः सबसे अच्छी बात तो यही कि आप अपने ही अक्स को अभिनीत कर सकते हैं. और परेशान करने वाली बात यह कि आपको एक इशारे पर हंसने और रोने के लिए जज्बात को झकझोरना पड़ता है. यह आसान नहीं है.

 

सवालः ऐसा रोल जिसने आपकी जिंदगी बदल दी?

आयुष्मानः दम लगा के हइशा में मेरे किरदार में खांटी मर्दों वाली ऐंठ थी. इंटरवल से पहले एक सीन में पत्नी मुझे झापड़ लगाती है. उसे खींचकर जडऩे का फैसला मेरा था क्योंकि मैं छोटे शहरों वाली मर्दानगी में जी रहा था. उस फिल्म के बाद मेरा मर्दाना गुरूर कम हो गया.

 

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