सैलरी आते ही लोगों के चेहरे पर जो खुशी आती है वह शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है. लेकिन सैलरी आते ही आपके दिमाग में तरह-तरह के खर्चे सामने आ जाते हैं और अगर कभी सैलरी वीकेंड पर आ जाए तो पैसे कहां जाते हैं, मालूम ही नहीं चलता है. ये परेशानी केवल आपकी नहीं है बल्कि ज्यादातर लोगों की है. लेकिन हाल के समय में युवा पैसों की सेविंग के लिए नए तरीके अपना रहे हैं.
सैलरी मिलने के बाद का पहला वीकेंड मेरे लिए बहुत खास होता है. जैसे ही सैलरी क्रेडिट का मैसेज आता है, मैं खुश हो जाती हूं. शुक्रवार शाम को मैं खाने की ऐप्स देखने लगती हूं. कभी कॉफी मंगा लेती हूं, कभी कोई स्किन केयर का सामान खरीद लेती हूं. फिर दोस्तों के साथ डिनर का प्लान बन जाता है. डिनर के साथ डेजर्ट, ड्रिंक्स और घर लौटने के लिए कैब का खर्च भी जुड़ जाता है. देखते ही देखते मेरे खाते से पैसे जल्दी-जल्दी खर्च हो जाते हैं.
लेकिन इस वीक मैंने कुछ अलग करने का ट्राई किया. मैंने पूरे वीकेंड में पैसे खर्च न करने का नियम बनाया. न ऑनलाइन शॉपिंग की, न खाना ऑर्डर किया, न कॉफी पीने के लिए बाहर गई. छोटी-छोटी चीजों पर भी पैसे खर्च नहीं किए. सेल्फ केयर के नाम पर कोई फालतू खरीदारी नहीं की. बस दो दिन बिना पैसे खर्च किए बिताए.
घर वालों ने दी प्रतिक्रिया
लेकिन जो बात सबसे खास थी कि वह ये हैं कि मेरे इस बदलाव को मेरे घर वालों ने भी नोट किया. मां ने हैरानी से देखा और पूछा कि सब ठीक तो है. पापा ने भी मजाक में पूछा कि बेटा, कोई परेशानी तो नहीं है? मेरी पेट डॉग भी परेशान लग रही थी. उसे रोज डिलीवरी वाले के आने की आदत हो गई थी. जैसे ही बाहर कोई आवाज होती, वह गेट की तरफ दौड़ जाती. लेकिन इस वीकेंड कोई डिलीवरी नहीं आई. न कोई खाना आया, न कोई सामान. वह बार-बार गेट की तरफ देखती रही, जैसे किसी का इंतजार कर रही हो.
महंगे कॉफी से होती है शुरुआत
शनिवार की सुबह हो गई. आमतौर पर मैं वीकेंड की शुरुआत बाहर से कॉफी मंगाकर करती हूं, लेकिन इस बार मैंने घर पर ही कॉफी बनाई. हैरानी की बात यह थी कि उसका स्वाद भी अच्छा था. शुरुआत के कुछ घंटे आसान रहे. मुझे लग रहा था कि मैं अपने पैसे बचाने के फैसले पर पूरी तरह कायम हूं. लेकिन दोपहर होते-होते मन डगमगाने लगा. मैंने फूड डिलीवरी ऐप खोल लिया. कुछ ऑर्डर करने के लिए नहीं, बस देखने के लिए. मैं काफी देर तक खाने की चीजों को देखती रही, फिर समझ आया कि मैं बिना खरीदे ही खाने का सपना देख रही हूं. इसलिए मैंने तुरंत ऐप बंद कर दिया.
घबरा गए पापा
परेशानी यहीं पर खत्म नहीं हुई. मेरे नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन भी खत्म हो चुका था. आमतौर पर ऐसी स्थिति में मैं तुरंत नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन फिर से ले लेती हूं. लेकिन इस बार मैंने ऐसा नहीं किया. इसे देखकर मेरे पापा ने कहा कि वे इसका भुगतान कर देंगे, लेकिन मैंने मना कर दिया. अगर मैं अपनी चुनौती को सच में निभाना चाहती थी, तो किसी और से भुगतान करवाना भी सही नहीं लगता था. इसके बाद कुछ समय तक मैं बोर होती रही. आदत के कारण मैंने कई बार नेटफ्लिक्स खोलने की कोशिश की फिर याद आया कि मैंने इस वीकेंड कुछ भी खर्च न करने का फैसला किया है.
फिर मैंने अपना समय परिवार के साथ बिताने का फैसला किया. मैं अपने माता-पिता के साथ बैठ गई और हम पुरानी तस्वीरें और वीडियो देखने लगे. उन्हें देखते हुए कई मजेदार यादें ताजा हो गईं- पुराने जन्मदिन, छुट्टियों की तस्वीरें, अजीब हेयरकट और बचपन की कई मजेदार बातें. काफी समय बाद हम सबने साथ बैठकर इतना अच्छा टाइम बिताया.
वीकेंड का क्या प्लान है?
मेरी मां ने इस दौरान हर घटना को इतने अच्छे से बयां किया मानो क्रिकेट की कमेंट्री कर रही हों. मेरे पापा ज्यादातर समय यही बताते रहते थे कि पहले सब कुछ कितना सस्ता हुआ करता था. मेरी पेट भी मेरी पास ही लेटी हुई थी और कभी-कभी हमें ऐसे देखती थी जैसे उसे समझ नहीं आ रहा हो कि हम टीवी देखने के बजाय पुरानी बातें क्यों कर रहे हैं.
शाम तक मुझे एहसास हुआ कि मैं काफी देर से परिवार के साथ बैठी हूं और खूब हंस भी रही हूं. यह किसी वेब सीरीज से कम मजेदार नहीं था. पुरानी यादें, तस्वीरें और किस्से सुनना बहुत अच्छा लगा. इसके बाद सबसे बड़ा टास्क जो आया वो था दोस्तों का मैसेज.
उन्होंने पूछा कि वीकेंड का क्या प्लान है? आमतौर पर इसका मतलब बाहर जाना और पैसे खर्च करना होता है. कॉफी, खाना, फिल्म या किसी और चीज पर खर्च हो ही जाता है. एक पल के लिए मुझे लगा कि मैं अपने इस चैलेंज को छोड़ दूं लेकिन फिर मुझे एक आसान तरीका सूझ गया. मैंने अपने दोस्तों को पास के एक पार्क में इवनिंग वॉक पर बुलाया. कोई प्रवेश शुल्क नहीं. कोई खर्च नहीं. कोई लालच नहीं. बस गपशप और थोड़ी-बहुत सैर.
बिना पैसों के भी दोस्तों के साथ बिता सकते हैं समय
हमें जल्दी ही समझ आ गया कि बिना किसी रेस्टोरेंट या कैफे में गए भी दोस्तों के साथ अच्छा समय बिताया जा सकता है. हम साथ टहलते रहे, बातें करते रहे और खूब हंसे. सबसे अच्छी बात यह थी कि किसी ने भी कुछ ऑर्डर करने की बात नहीं की. यह अनुभव काफी अच्छा लगा. ऐसा लगा जैसे बिना पैसे खर्च किए भी वीकेंड का मजा लिया जा सकता है.
असली चुनौती रविवार को आई. मौसम बहुत गर्म था और दोपहर तक मुझे आइसक्रीम खाने का बहुत मन होने लगा. आमतौर पर मैं तुरंत आइसक्रीम ऑर्डर कर देती, लेकिन इस बार मैंने घर पर ही कुछ बनाने का फैसला किया. फ्रीजर में रखे हुए केले निकाले, उनमें ठंडा दूध, थोड़ा कोको पाउडर और थोड़ा शहद मिलाकर ब्लेंड कर लिया.
मैंने इसे एयर कंडीशनर के सामने खड़े होकर खाया और इस दौरान मुझे जीत का एहसास हुआ. सिर्फ इसलिए नहीं कि वह स्वादिष्ट थी, बल्कि इसलिए भी कि मैंने बिना पैसे खर्च किए अपनी इच्छा पूरी कर ली थी. मां को भी वह पसंद आई, इसलिए उन्होंने भी थोड़ी खाई. पापा ने मजाक में कहा कि पैसे भी बच गए और मीठा भी मिल गया. हमारे घर में इससे बड़ी तारीफ शायद ही कोई हो.
धीरे-धीरे वीकेंड बीतने लगा और एक दिलचस्प बात समझ में आई. पैसे खर्च करने की इच्छा कम होने लगी. मैंने ध्यान दिया कि कई बार मैं जरूरत के कारण नहीं बल्कि बोरियत या आदत की वजह से पैसे खर्च करती हूं. कभी किसी ऑफर को देखकर तो कभी किसी ऐप के नोटिफिकेशन की वजह से.
हर बार जब कुछ खरीदने का मन होता, मैं खुद से पूछती हूं कि इसकी सच में जरूरत है या नहीं. ज्यादातर बार जवाब यही होता था कि मुझे उस चीज की जरूरत नहीं थी. मैं बस थोड़ी देर की खुशी के लिए ऐसा करती थी. तब मुझे एहसास हुआ कि यह वीकेंड सिर्फ पैसे बचाने के बारे में नहीं था बल्कि अपनी आदतों को समझने के बारे में भी था.
इस वीकेंड कई बातों का हुआ एहसास
मुझे एहसास हुआ कि पैसे मेरे लिए रोमांच का शॉर्टकट बन गया था. खर्च किए बिना, मैं मनोरंजन खुद ही पैदा करने के लिए मजबूर हो गई थी. मैंने अपने पेट डॉग के साथ ज्यादा समय बिताया जिसे देखकर वह बहुत खुश थी, हालांकि उसे डिलीवरी वालों की कमी थोड़ी खली. मैंने रसोई में मां की मदद की. पापा के साथ बैठकर चाय पी और उनकी वही पुरानी कहानियां सुनीं, जिन्हें मैंने पहले भी सुना था लेकिन इस बार ध्यान से सुना.
मैंने घर की सफाई की और पुराने सामान देखे. कुछ पुरानी चीजें याद आईं.लंबे समय बाद मुझे ऐसा लगा कि वीकेंड सिर्फ भागदौड़ में नहीं बीता. रविवार तक मेरे माता-पिता भी इस बदलाव को नोटिस करने लगे थे. मां ने कहा कि उन्हें यह अच्छा लगा और पापा ने मजाक में कहा कि मुझे इसे हर महीने करना चाहिए.
सबसे हैरानी की बात यह थी कि मेरा बैंक बैलेंस बिल्कुल वैसा ही था जैसा शुक्रवार को था. आमतौर पर वीकेंड के बाद पैसे कम हो जाते थे, लेकिन इस बार नहीं. मुझे समझ आया कि यह सिर्फ पैसे बचाने का तरीका नहीं था, बल्कि सोच बदलने का तरीका था. मैंने सीखा कि हर बार तुरंत खरीदने से पहले थोड़ा रुककर सोचना चाहिए कि क्या सच में इसकी जरूरत है. मैं हमेशा ऐसा नहीं कर पाऊंगी, क्योंकि आदतें आसानी से नहीं बदलतीं. लेकिन अब हर बार कुछ खरीदने से पहले यह सोच जरूर आता है कि क्या यह सच में जरूरी है.
वैष्णवी पराशर