श्रम कानूनों में सुधार: इंडस्ट्री का हित या मजदूरों का शोषण? जानें तमाम पक्षों की राय

कई राज्यों ने अचानक अपने श्रम कानूनों में भारी बदलाव कर दिए. खासकर यूपी में तो कई ऐसे कानूनों को तीन साल के लिए खत्म कर दिया गया जिनकी वजह से कामगारों को संरक्षण मिलता था. इनकी तमाम श्रम संगठनों और विपक्ष के द्वारा घोर आलोचना की जा रही है. कांग्रेस ने शुक्रवार को विपक्षी दलों की एक बैठक बुलाई है, उसमें भी इस पर चर्चा होने की संभावना है.

श्रमिक कानूनों को नरम बना रहीं राज्य सरकारें (फाइल फोटो: मिलिंद शेते)
दिनेश अग्रहरि
  • नई दिल्ली,
  • 20 मई 2020,
  • अपडेटेड 8:33 PM IST

  • यूपी, एमपी सहित कई राज्य सरकारों ने किए श्रम सुधार
  • श्रम कानूनों को इंडस्ट्री के पक्ष में काफी नरम किया गया
  • मजदूरों के हितों वाले कई कानूनों को खत्म किया गया
  • श्रमिक संगठन और विपक्षी दल इसकी कर रहे आलोचना

कोरोना महामारी से उपजे हालात के बीच उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात जैसे कई राज्यों ने अचानक अपने श्रम कानूनों में भारी बदलाव कर दिए. खासकर यूपी में तो कई ऐसे कानूनों को तीन साल के लिए खत्म कर दिया गया जिनकी वजह से कामगारों को संरक्षण मिलता था. इनकी तमाम श्रम संगठनों और विपक्ष के द्वारा घोर आलोचना की जा रही है. ये बदलाव जरूरी थे या इंडस्ट्री के दबाव में सरकार ने ऐसा किया है? Aajtak.in ने नेताओं, श्रमिक संगठनों, इंडस्ट्री चैंबर जैसे तमाम पक्षों से बात कर इसे समझने की कोशिश की.

श्रम कानूनों में क्या हुए बदलाव

सबसे पहले तो यह जान लें कि विभिन्न राज्यों और खासकर यूपी में श्रम कानूनों में क्या बदलाव हुए हैं. असल में यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार इस मामले में विपक्ष के ज्यादा निशाने पर है, क्योंकि उसने कई ऐसे कानूनों को तीन साल के लिए खत्म कर दिया जिनके बारे में कहा जाता है कि वे कामगारों को पूंजी​पतियों, इंडस्ट्री के शोषण से बचाते थे.

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गत 6 मई को यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक ऑर्डिनेंस लाकर सभी कारखानों और प्रतिष्ठानों को तीन साल के लिए ज्यादातर लेबर लॉ से मुक्त कर दिया. इनमें यूनियन के गठन का अधिकार, औद्योगिक विवाद की स्थिति में शिकायत करने का अधिकार और समुचित मशीनरी से उसका निराकरण पाने का अधिकार शामिल हैं. यूपी में अब सिर्फ बिल्डिंग ऐंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स एक्ट 1996, वर्कमेन कंपेनजेशन एक्ट 1923, बॉन्डेड लेबर सिस्टम (Abolition) एक्ट 1976 और वेजेज पेमेंट एक्ट 1936 का सेक्शन 5 यानी समय से वेतन पाने का अधिकार ही बचा रह गया है. सरकार ने काम के घंटे भी 8 से बढ़ाकर 12 करने का निर्णय लिया था, लेकिन इस पर हाईकोर्ट से नोटिस मिलने के बाद फिलहाल इसे निरस्त कर दिया गया है.

जिन बदलावों का है सबसे ज्यादा विरोध

-न्यूनतम वेतन मिलने का अधिकार खत्म करना

-बुनियादी सुरक्षा तथा कल्याणकारी मानकों की अनुपस्थिति

-इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट को खत्म कर देना

-यूनियन के गठन का अधिकार खत्म करना

-हफ्ते में 72 घंटे तक यानी हर दिन 12 घंटे काम ( हाईकोर्ट के नोटिस के बाद इसको सरकार ने निरस्त कर दिया है)

एमपी सरकार ने किए ये बदलाव

दूसरी तरफ, एमपी सरकार ने सिर्फ कुछ बदलाव किए हैं. एमपी ने 11 तरह के उद्योगों को मध्य प्रदेश इंडस्ट्रियल रिलेशंस एक्ट 1961 से छूट दे दी है. इसी तरह इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट, 2000 के कई प्रावधानों से भी नई इंडस्ट्री को अगले 1,000 दिनों के लिए छूट दे दी गई है. ऐसी इंडस्ट्री को किसी कामगार को निलंबित करने के लिए सरकार की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी. यूपी ने ज्यादा सख्त रवैया अपनाया है, इसलिए यूपी सरकार की इस मामले में ज्यादा आलोचना भी हो रही है.

कई जानकार तो यह भी कह रहे हैं कि यूपी सरकार का नया ऑर्डिनेंस असंवैधानिक है और इसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. इसे अमानवीय और मजदूरों के हितों के पूरी तरह से खिलाफ बताया जा रहा है.

खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ भी इसके विरोध में खड़ा हो गया है. कांग्रेस ने शुक्रवार को विपक्षी दलों की एक बैठक बुलाई है. उसमें भी इस पर चर्चा होने की संभावना है. दूसरी तरफ, इंडस्ट्री यूपी सरकार की इस घोषणा से बल्ले-बल्ले है और इसका जबर्दस्त स्वागत कर रही है.

भारतीय मजदूर संघ ने विभिन्न राज्यों द्वारा लेबर लॉ को खत्म करने की कवायद को अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है. मजदूरों संगठनों का कहना है कि सरकारों ने हायर ऐंड फायर करने, मजदूरों के तमाम अधिकारों को खत्म करने की यह पॉलिसी उद्योग जगत के दबाव में बनाया है और इसके लिए कोरोना संकट जैसे मौके का फायदा उठाया गया है. जानकारों का कहना है कि अब तो चीन में भी यहां के कामगारों से ज्यादा सामाजिक सुरक्षा हासिल है.

विरोध में उतरेगा RSS का मजदूर संघ

भारतीय मजदूर संघ के उपाध्यक्ष जयंती लाल कहते हैं, 'इसमें सबसे पहले तो जो बुनियादी अधिकार होता है, उसके मुताबिक सभी पक्षों से बात होनी चाहिए थी. समस्या मजदूर नहीं, किसी भी इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ी समस्या सरकारी तंत्र है. वर्कर तो अपनी रोजी-रोटी कमाने आता है. आप उसके हाथ-पांव बांध देंगे, न्यूनतम वेतन भी नहीं देंगे, अपनी बात रखने का अधिकार नहीं देंगे तो कैसे चलेगा? अभी कोरोना के दौर में प्रवासी मजदूरों की जो हालत है उससे तो यही लगता है कि कानून और कठोर होना चाहिए. सरकार तो उलटा कर रही है.'

ब्यूरोक्रेट और उद्योगपतियों के दबाव में यूपी सरकार!

जयंती लाल ने कहा, 'भारतीय मजदूर संघ इसका विरोध करता है. हम इसके लिए व्यापक आंदोलन करेंगे. सरकार किसी की भी हो, हम इसका विरोध करेंगे. हमने राज्य सरकार को अपना विरोध पहुंचा दिया है. कम से कम बेसिक कानून न्यूनतम वेज, काम के 8 घंटे तय होने ही चाहिए. 12 घंटे आदमी काम करेगा तो परिवार को क्या समय देगा? यह कुछ ब्यूरोक्रेट और उद्योगपतियों के दबाव में सरकार का मूर्खतापूर्ण प्रयास है.'

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इसे समग्रता से देखने की जरूरत

दूसरी तरफ, इंडस्ट्री जगत यूपी सरकार की इन घोषणाओं का जमकर स्वागत कर रहा है. एसोचैम के प्रेसिडेंट और नारडेको के चेयरमैन डॉ. निरंजन हीरानंदानी कहते हैं, 'कोविड-19 महामारी से इंडस्ट्री काफी चुनौतियों का सामना कर रही है. इसलिए ऐसा वातावरण तैयार करने की जरूरत है जिसमें कारोबारी संगठन अपना अस्तित्व बनाए रख सकें. मैं इसे इस मजदूर समर्थक या इंडस्ट्री समर्थक नजरिए से नहीं देखना चाहता, बात बस यह है कि ऐसे हालात बन गए हैं, जिसमें आर्थिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ समय के लिए नियम-कायदों में बदलाव जरूरी हैं. दुनियाभर की जो कंपनियां अब चीन से अपने कारखाने दूसरे देशों में ले जाने की सोच रही हैं, उनके लिए उत्तर प्रदेश अपने को बेहतर विकल्प के रूप में स्थापित कर रहा है'

यूपी सरकार ने सही समय पर उठाया सही कदम

पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (यूपी चैप्टर) के को-चेयरमैन मनीष खेमका ने कहा, 'यह स्वागतयोग्य कदम है. सरकार के इस कदम से कारोबार और रोजगार को बढ़ाने में मदद मिलेगी. देश में सबसे बड़ी आबादी उत्तर प्रदेश में रहती है. प्रवासी मजदूरों की भी बड़ी संख्या यूपी में आ रही है जिनका वापस जाना अभी मुश्किल है. इन्हें राज्य में ही रोजगार देने की पहल करनी होगी. तो यूपी सरकार ने सही समय पर सही कदम उठाया है.'

उन्होंने कहा, 'इसमें श्रमिकों के लिए जरूरी तमाम कानूनों को बरकरार रखा गया है. तो इससे श्रमिकों का भी अहित नहीं होगा और नौकरियों पर जो खतरा है, वह काफी हद तक कम होगा. हमें यह सोचना होगा कि तमाम कारोबारी संस्थान बंद हो जाएं या चलते रहें? जब संस्थान चलेंगे तो ही रोजगार दे पाएंगे. नीतियां ऐसी होनी चाहिए जिससे सभी का भला हो.'

यूपी कांग्रेस सड़कों पर उतरेगी

उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने कहा, 'आज मजदूरों को इस बात की जरूरत थी कि सरकारें उनके साथ खड़ी हों. लेकिन श्रमिकों के खिलाफ कानून लाकर सरकारों ने उनके साथ धोखा किया है. UP सरकार ने इस पूरे कानून में बदलाव लाकर श्रमिकों के ​हक पर डाका डालने का प्रयास किया है. कांग्रेस इसके खिलाफ यूपी के सदन में और सड़क पर विरोध करेगी. हम इसके खिलाफ निजी विधेयक भी लाएंगे. यूपी सरकार ने काला कानून बनाया है. सरकार ने पहले तो मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया और अब उनके खिलाफ कानून ला रहे हैं.'

रोजगार-निवेश बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम

भारतीय जनता पार्टी, उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष जेपीएस राठौर ने कहा, 'यह प्रदेश में रोजगार और निवेश बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. यह प्रदेश की हजारों MSME को मजबूत करने के लिए भी है, ताकि इनमें बड़े पैमाने पर रोजगार मिल सकें. यूपी में संसाधन की कमी नहीं है, प्राकृतिक संसाधन है, बड़ी संख्या में मजदूर भी हैं. इसलिए श्रम सुधार और कानून-व्यवस्था जैसी जो अन्य जरूरी चीजें हैं उसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं. कांग्रेस जैसे विपक्षी तो हर अच्छी चीज की आलोचना कर रहे हैं.'

लॉकडाउन का फायदा उठाकर बनाया मजदूर विरोधी कानून!

वामपंथी विचार वाले ऑल इंडिया सेंटर फॉर ट्रेड यूनियन्स (AICTU) के महासचिव अभिषेक कहते हैं कि समस्या का समाधान निकालने की जगह सरकारों ने और इसे बढ़ाया है. उन्होंने कहा, 'इंडस्ट्री को सपोर्ट करने का मतलब मजदूर की मौत नहीं होती. मिनिमन वेज तो फंडामेंटल राइट है. लोगों का गला घोंटकर ही मुनाफा नहीं कमाया जा सकता. इंडस्ट्री के लिए भी यह जरूरी है कि मजदूर को ठीक से वेतन, खाना, प्रोटेक्शन मिले. इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट खत्म करने का मतलब यह है कि मजदूर अपने साथ ज्यादती की शिकायत नहीं कर पाएंगे. क्या इससे इंडस्ट्री बढ़ जाएगी? सरकार ने लॉकडाउन का फायदा उठाते हुए, गलत कदम उठाया है. मजदूर विरोधी कानून बनाया है. मजदूरों को और गर्त में ढकेल रही है सरकार.'

चीन से यूपी आएंगे कारखाने?

जानकारों का मानना है कि यूपी सरकार ने इंडस्ट्री का दबाव शायद इस वजह से स्वीकार कर लिया है, क्योंकि उसे लगता है कि चीन से बाहर जाने वाले कारखाने भारत में आने पर नरम श्रम कानून से आकर्षित होकर यूपी का रुख करेंगे. हालांकि वास्तव में कारखाने आएंगे या नहीं, इसको लेकर भी संशय है, क्योंकि वे ताइवान, बांग्लादेश जैसे दूसरे देशों में ज्यादा जाना पसंद करते रहे हैं, जहां भारत से भी ज्यादा सहूलियत और सस्ता मजदूर हासिल है.

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भारतीय मजदूर संघ के जयंती लाल ने कहा, 'दुनिया भर की इंडस्ट्री चीन में गई थी कमाने के लिए, कोई वर्कर या देश का भला सोचकर नहीं जाते. ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना उनका उद्देश्य रहता है तो वे ऐसे देश में जाते हैं जहां सस्ता से सस्ता मजदूर मिले. अगर विदेशी इंडस्ट्री आती है और उससे वर्कर का फायदा न हो तो उसके आने का क्या फायदा?'

जानकारों का कहना है कि देश में असल समस्या दूसरी है. पानी से लेकर बिजली कनेक्शन, पर्यावरण से लेकर अन्य तमाम नियामकीय मंजूरी हासिल करने में भ्रष्टाचार और लालफीताशाही का बोलबाला है. सबसे पहले इनमें सुधार की जरूरत है.

सरकारें इस बात का तर्क दे रही हैं कि इन प्रावधानों से इंस्पेक्टर राज खत्म होगा और विदेशी निवेश आकर्षित होगा. असल में विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए आकर्षित इस आधार पर ही किया जाता है कि यहां श्रम कानून अंतरराष्ट्रीय चलन के अनुरूप हैं और तमाम कायदे-कानून लचीले हैं. इसलिए अब राज्य सरकारें श्रम कानूनों में बदलाव, भूमि सुधार जैसे उपायों पर जोर दे रही हैं.

लेकिन क्या इसके लिए श्रमिकों के बुनियादी अधिकारों और मानवीय पहलू को नजरअंदाज किया जा सकता है? यही बड़ा सवाल है.

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