कर्ज में डूबते जा रहे हैं भारतीय, 5 साल में 58% बढ़कर 7.4 लाख करोड़ हुई देनदारी

पांच साल में परिवारों का कर्ज दोगुना हुआ है, जबकि इस दौरान खर्च करने वाली आमदनी महज डेढ़ गुना बढ़ी है. इसका नतीजा हुआ है कि देश का कुल बचत में 4 फीसदी की बड़ी गिरावट आई है और यह 34.6 फीसदी से गिरकर 30.5 फीसदी पर सिमट गई है.

बढ़ रही है देनदारी (प्रतीकात्मक तस्वीर)
दीपू राय
  • नई दिल्ली,
  • 16 सितंबर 2019,
  • अपडेटेड 5:34 PM IST

  • वित्तीय देनदारी 58% बढ़कर 7.4 लाख करोड़ रुपये हुई
  • देश की कुल बचत में 4 फीसदी की आई बड़ी गिरावट

भारतीय अर्थव्यवस्था की जान कहे जाने वाले घरेलू बचत की हवा निकल गई है. पांच साल में कुल देनदारी 58 फीसदी बढ़कर 7.4 लाख करोड़ रुपये रह गई है, जबकि साल भर पहले यानी 2017 में यह बढ़ोतरी महज 22 फीसदी रही. यह आंकड़ा देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रिसर्च विंग का है. 

इस पांच साल में परिवारों का कर्ज दोगुना हुआ है जबकि इस दौरान खर्च करने वाली आमदनी (जिसे अंग्रेजी वाले डिस्पोजेबल इनकम कहते हैं) महज डेढ़ गुना बढ़ी है. इसका नतीजा हुआ है कि देश की कुल बचत में 4 फीसदी की बड़ी गिरावट आई है और यह 34.6 फीसदी से गिरकर 30.5 फीसदी पर सिमट गई है.

बचत की इस बड़ी गिरावट की सबसे बड़ी वजह घरेलू स्तर पर बचत में आई गिरावट है. इस पांच साल में परिवारों की बचत तकरीबन छह फीसदी (जीडीपी) गिरी है. वित्तीय साल 2012 में जो घरेलू बचत दर 23.6 फीसदी थी वो 2018 में घटकर 17.2 फीसदी रह गई.

बचत में भारी गिरावट का असर अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है.

देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का कहना है कि केवल कर्ज रेट कम करने से मामला नहीं सुलझेगा अब सरकार की ओर से कुछ और पहलकदमी करनी होगी. बैंक ने अपने रिसर्च नोट में कहा है कि कैपिटल गेन टैक्स को हटाने के बाद 2018 में वित्तीय बचत पर कुछ असर दिखा, लेकिन 2019 में यह कम हो गया.

बैंक का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र में सरकार को मांग बढ़ाने के लिए कुछ खर्चों यानी को बढ़ाना चाहिए.किसानों को आर्थिक मदद के लिए जो स्कीम शुरू हुई है, उसमें अभी तक टार्गेट से कम किसानों का आवंटन हुआ है. पीएम-किसान पोर्टल के आंकड़े बताते हैं कि लक्ष्य से तकरीबन आधे किसानों की पंजीकरण हुआ है. जून 2019 तक 6.89 करोड़ किसानों का वैलिडेशन हुआ था जबकि टार्गेट 14. 6 करोड़ का था. इसे बढ़ाकर ग्रामीण मांग बढ़ाई जा सकती है.

बजट में आवंटित रकम को खासकर पूंजीगत खर्चों में कमी दर्ज की गई है. अभी तक सरकार की केवल 32 फीसदी रकम ही खर्च हो पाई है. जबकि पिछले साल इस दौरान 37.1 फीसदी रकम खर्च हुई थी.

निजी निवेश में भी भारी गिरावट आई है. 2007 से 2014 के दौरान होने वाली 50 फीसदी की जगह 2014 से 2019 के दौरान 30 फीसदी पर सिमट गई है.

ये आंकड़े साफ बताते हैं कि यह केवल वित्तीय संकट भर नहीं है और इसकी जड़ें कहीं ज्यादा गहरी हैं. अब देखना है कि सरकार की ओर से जारी होने वाले एक-एक करके बेलआउट पैकेज इसे उबारने में कितना मदद करते हैं.

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